want to know you better | तुम्हें ठीक से जानना चाहता हूं: माधुरी, कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चलें, कितना वक्त हो गया तुम्हारे साथ समय बिताए

1 घंटे पहले

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“लगता है फिर खो गई हो पुरानी यादों में? बचपन बीत गया है, दो बच्चों की मां बन गई हो, पर न जाने कौन से काठ-कबाड़ निकालती रहती हो हमेशा,” रंजन ने उसका उपहास उड़ाते हुए कहा।

“रंजन, ये मेरी वे यादें हैं जिन्हें मैंने जीया है। ये काठ-कबाड़ नहीं हैं। मैं यह नहीं कहती कि अतीत की परछाइयों के साथ जीओ, पर वे पल जो गुजर गए हैं, वे खुशियों से भरे थे। वे बातें, वे घटनाएं, जिनके बारे में सोचते ही होंठों पर हंसी थिरक जाए, उनके बारे में अगर कभी-कभी बात कर ली जाए तो वे जिंदगी में रंग भर देती हैं। वैसे भी किससे बात करूं। न ही तुम्हारे पास मेरे लिए वक्त है न ही बच्चों के पास। इसी यादों के पिटारे को जब-तब निकाल कर कुछ पल खुश हो लेती हूं। ऐसा लगता है कि उन बीते लम्हों के साथ मैं संवाद कर पा रही हूं।” कहते-कहते वह भावुक हो उठी। ‘’सेंटीमेंटल फूल्स’ शब्द का ईजाद तुम्हारे जैसे लोगों के लिए हुआ है शायद। मुश्किल होता है ऐसे लोगों को झेलना।”

हर चीज को फायदे-नुकसान से माप-तौलकर देखना रंजन की आदत है वह नौकरी करती है, इसलिए वह उसे सह रहा है, इस बात का एहसास कराने से भी नहीं चूकता है। हालांकि यह भी जता देता है कि वह इतना कमाता है कि उसकी कमाई से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह जब चाहे नौकरी छोड़ सकती है। रंजन के माथे पर हमेशा त्योरियां चढ़ी रहती हैं। उसे समझाना बेकार है कि एक पत्नी को पति से रोटी के अतिरिक्त भी कुछ अपेक्षाएं हो सकती हैं। एक पत्नी पति से प्यार और थोड़ा-सा सम्मान चाहती है।

कुछ देर उसके पास बैठ कर उसके दिल की बातें सुन ले और यह आश्वासन दे दे कि मैं तुम्हारे साथ हूं, बस माधुरी ने भी यही चाहा था। उसके पीछे छूटे रिश्तों और स्मृतियों को सहेजे नहीं, लेकिन कम से कम मजाक भी न उड़ाए, उसका ऐसा चाहना क्या बहुत ज्यादा एक्सपेक्ट करने के ब्रैकेट में आता है। रंजन अक्सर कहता है ,‘तुम्हारी अपेक्षाएं जरूरत से ज्यादा हैं। आगे बढ़ो और जिंदगी को बिंदास होकर जीओ। और जीने के लिए जो करना पड़े, करो। क्या हमेशा रिश्तों को जीने की बात करती रहती हो। मुझे देखो सालों बीत गए, कभी जाता हूं इंदौर या जबलपुर अपने भाई-बहनों से मिलने।’ रंजन की सोच से डर लगता है उसे। आखिर क्यों रंजन ने अपने चारों ओर असंख्य जाले बुने हुए हैं, मकड़ी के जालों की तरह। “तुमसे बात करने और यहां तक कि पास आने में डर-सा लगने लगा है,” एक दिन दिल की बात निकल ही गई थी माधुरी के मुंह से।

“क्यों क्या मैं कैक्टस हूं, जिसे छूने से तुम्हारी अंगुलियों लहुलूहान हो जाएंगी। समझती क्या हो अपने आप को?। जब देखो यादों और रिश्तों में जीती रहती हो। जिंदगी किसी फिल्म की तरह नहीं होती है।”

जुड़ाव नाम की चीज रंजन में नहीं है। शादी के बाद अजीब लगा था उसका व्यवहार। यह तो नहीं कहेगी कि उसे आदत हो गई, लेकिन उन दोनों के बीच एक दीवार सी खिंच गई, जिसे तोड़ने की कोशिश उसने करनी छोड़ दी है। बच्चे बड़े हो रहे हैं, इसलिए नहीं चाहती कि घर का माहौल खराब हो।

यह ठीक है कि परिस्थितयों ने रंजन को ऐसा बना दिया है, पर वह उसे कितनी बार समझा चुकी है कि अब सब कुछ बदल चुका है। उसके जीवन में प्यार और भरोसा करने वाली उसकी पत्नी है, बच्चे हैं, लेकिन वह अब भी अपने में ही सिमटा रहता है। मां-बाप के बचपन में ही गुजर जाने के बाद रंजन ने जो तकलीफें सही और रिश्तेदारों ने भरोसा तोड़ा, उससे उसके अंदर भरी कड़वाहट अभी तक बाहर नहीं निकली है। सबसे छोटा होने पर भी भाई-बहनों ने उसकी परवाह नहीं की। संघर्षों से लगातार जूझते रहने के कारण सेंटीमेंट्स तो क्या बचते रंजन में, सहजता भी बाकी न रही।

माधुरी और बच्चों का प्यार व भरोसा पाने के बाद भी रंजन के भीतर जमा आक्रोश आज तक नहीं निकला है। बच्चे भी डरते हैं उससे। वह भी रंजन की तरह होती तो कभी भी रिश्तों को संभालकर नहीं रख पाती ।

रंजन का रिश्तेदारी में आना-जाना नहीं, चाहे अपने ही भाई-बहन के यहां ही क्यों न जाना हो। फोन पर भी उनसे बात नहीं करता। कितने जरूरी होते हैं ये रिश्ते, रंजन समझता ही नहीं।

अंकिता और पारित के आपसी प्यार और तकरार को देखती है तो सोचती है कि आज एक दूसरे के बिना न रहने वाले ये भाई-बहन क्या बड़े होकर अपनी इन खट्टी-मीठी यादों का मजाक उड़ाएंगे। क्या ये भी एक दिन अपने इस प्यार और तकरार को भूल जाएंगे। इनके बीच भी संवेदनहीनता पसर जाएगी? “क्या जरूरत है यह सब तमाशा करने की? मैं तो तुम्हारी मम्मी के कितने ही चाचा-फूफा को जानता नहीं। कोई पार्टी की जरूरत नहीं है, चलेंगे किसी होटल में डिनर करने बस।” उनकी शादी की बीसवीं सालगिरह थी और बच्चे जिद कर रहे थे कि एक बड़ा-सा आयोजन किया जाए।

“नो पापा, इस बार तो आपको मानना ही पड़ेगा,” पारित अड़ गया था। “पापा, कितना समय हो गया है आपके परिवार के लोगों से मिले,” अंकिता बोली। रंजन की त्योरियां चढ़ गईं। अचानक पारित बोला,“ आपको क्या प्रॉब्लम है? आप खुश क्यों नहीं रह सकते? आपकी वजह से घर का माहौल हमेशा भारी रहता है। हमें घर में अपने फ्रेंड्स को बुलाने में डर लगता है। इससे तो अच्छा है हम साथ ही न रहें।”

“ज्यादा बकवास करने की जरूरत नहीं है,” रंजन चिल्लाया।

“तो ठीक है, अब मैं हम आपके साथ नहीं रहेंगे।”

इतना आक्रोश…रंजन हैरान रह गया। आज तक बच्चों ने कभी उसे उलटा जवाब नहीं दिया था। “ऐसा क्यों कह रहे हो तुम? मैं भी क्या करूं, मैं ऐसा बन गया हूं।” रंजन की आवाज में कंपन महसूस किया माधुरी ने। “जब दस साल का था पेरेंट्स गुजर गए। बड़े भाई-बहन भी बहुत ज्यादा उम्र के नहीं थे। रिश्तेदारों ने सारी प्रॉपर्टी हड़प ली और हम लोगों को अपने-अपने तरीके से संघर्ष करना पड़ा। बीस साल का था जब दिल्ली चला आया और जो काम मिला किया।

भाई-बहनों से संपर्क टूट गया और लोगों पर से विश्वास तो पहले ही उठ गया था, इसलिए जुड़ाव जैसी भावना से अपने को दूर कर लिया। बस कमाने की धुन लग गई ताकि फिर से रोटी के लिए किसी का मुंह न ताकना पड़े। शायद इसीलिए इतना रूखा हो गया। याद नहीं मैं पिछली बार कब हंसा था।”

“पर पापा, अब तो सब बदल गया है, हम आपके साथ हैं, आपसे प्यार करते हैं, फिर कड़वी यादों को डिलीट क्यों नहीं कर देते अपनी मेमोरी से। मम्मी और हम तो आपके साथ हंसना चाहते हैं, खुल कर जीना चाहते हैं। क्या बहुत ज्यादा है आपके लिए यह सब करना? पारित और अंकिता रंजन से चिपट गए थे जाकर। पहली बार बिना किसी खौफ या हिचक के। माधुरी ने प्यार भरी नजरों से रंजन को देखा मानो कह रही हो, रंजन जी लो आज के सुखों को।

पार्टी में अपने भाई-बहनों, भतीजों और रिश्तेदारों को देखते ही रंजन के चेहरे पर छाई रहने वाली तिलमिलाहट और ‘मुझे परवाह नहीं’ वाली परत न जाने कहां गायब हो गई थी। शुरू में झिझक की हलकी सी झलक बेशक दिखाई दी थी, झुंझलाहट भी थी। आसान नहीं था उसके लिए सहज बने रहना, पर पारित और अंकिता उसके साथ ही बैठे रहे। रंजन के चेहरे पर हलकी-सी मुस्कान आई। भावनाओं का समुद्र उसकी आंखों को नम कर गया।

मेहमानों के जाने के बाद देर रात जब वह अपने भाई-बहनों के साथ बैठा तो यादों के न जाने कितने पिटारे खुल गए। वह इतना हंसा कि बच्चे भी हैरान रह गए। माधुरी को देखते हुए उसकी नजरों में ढेर सारा प्यार था, वही प्यार जिसकी चाह में उसने बरसों गुजार दिए थे। “माधुरी, कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चलें क्या? बच्चे तो अब अकेले रह सकते हैं। कितना वक्त हो गया है तुम्हारे साथ वास्तव में समय बिताए। तुम्हें ठीक से जानना चाहता हूं।” रंजन ने एक दिन उसका हाथ थामते हुए कहा। आंखों में प्यार और छुअन में सम्मान का एहसास हुआ उसे। उसने हौले से रंजन की नम आंखों को अपनी हथेलियां रख दीं।

-सुमन बाजपेयी

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